- समझसोच को कुछ सोचकर तू सोच से कर दे रिहा कुछ नहीं हासिल यहां यूं सोचने का ख़ामखां देखता है देखकर भी यूं तेरा ना देखनाक्या करेंगे देखकर भी ये तेरी गुस्ताखियां पानियों में पानियों सा हो रहा पानी रवांपानियों… Read more: समझ
- छलावाकरवटें लेती ये ज़िन्दगी ,किस किस मोड़ गुज़रेगी टूट रहीं हैं डोर सभी , और कितना उलझेगी ये परिन्दों की उड़ान सी , रोज़ नयी डाल ढूंढती हैये चांद के मचान सी , रोज़ नयी शाम ढूंढती हैये चलती भी… Read more: छलावा
- निवेदनरह जाओ दिल में हे गिरीघर प्रेम रूप तुम प्राण सरोवर भरो गार मेरी लीलाधर रह जाओ दिल मे दामोदर दिया सभी को सहज अमृतरसकहीं वीर तुम शौर्य के पथपरकभी गीतमय ज्ञान के सागरहरे चित्त के उग्र हलाहलदे पर मुझको… Read more: निवेदन
- तू मत आनातू मत आना कि अब कोई आरज़ू मुझको नहीं तू मत आना कि हम मिले थे ना मिलेंगे कभी तू मत आना कि सावन की बूंदों में असर नहींतू मत आना कि मेरी नज़र अब ढूंढे सहर नयी तू मत… Read more: तू मत आना
- तूने देखा तो होगाकितने घर जले तेरे नाम पे तूने देखा तो होगा फिर दर खुले तेरे नाम के तूने देखा तो होगा वो जहां सुना है तूपहले ज़मीं पर आया थावो ज़मीं जिसपर तूनेअपना महल सजाया थामचा ज़मी पर वहीं कहरवहीं से… Read more: तूने देखा तो होगा
- सांझएक मचान थे कबूतर बैठेउड़ गए सारे शाम ढलेजाने क्या तकने बैठे थेजाने क्या चुकने उड़े मरेउगता है सूरज दूर कहींइस मोड़ अभी बर शाम ढले एक तोता भी तो आता थाइस रुख होकर जाता थाकभी रुक कर कुछ कहता… Read more: सांझ
- मायूसीछोटी सी एक बात थी कुछ सोचकर तो आए थे थोड़े लफ़्ज़ , कुछ जज़्बात बटोरकर तो लाए थे ज़ुबां पर रख्खे थे तो पर जाने दे लेकिन इस बार कि वक़्त नहीं है तेरे पास जाने कितने चहरों के… Read more: मायूसी
- क्या कहें !!कुछ कहें ना कहें , क्या कहें! कहने को ना हो कुछ अगर ,फिर भी कहें , क्या कहें! बारिश बन गिरा है अभी ,कुछ मिट्टी में मिला है अभीबादल टूटें हैं कहींया ख़्वाब बूंद हुए सारेइन बूंदों में रहें,… Read more: क्या कहें !!
- इन्तज़ारदेर कर दी तुमने आने में,मेरे जाने का वक़्त हुआ!रुक जाते कुछ पल मेरे लिए,मेरा लहज़ा भी सक्ख्त हुआ!सुनकर ये मासूम शिकायतसूरज थोड़ा सा मुसकाया,बोला रे पागल इन्सानमैं कब था तेरे लिए आया..दिल मेरा मायूस हुआ,उसकी चमक भी भर आई,हर… Read more: इन्तज़ार
- झपकीमैं नींद में हूं , मुझे रहने दे ,दो पल यूं ही बहने दे..क्या पूछे कोई मुझसे ,अपना क्या, पराया क्यादुनिया में कमाया क्या ,छूटा क्या, मिटाया क्या,हमको रास आया क्या..मैं नींद में हूं , मुझे रहने दे जागेंगे तो… Read more: झपकी
- खिड़कीखिड़की सी ये ज़िन्दगी,परदों में सिमटी सी,परत दर परत परदे खुले,कुछ नये यूं रिश्ते जुड़े.. एक दिन खोला परदा थोड़ाएक पत्ता नज़र आया थाबहुत देर तक उस पत्ते को,अपना हाल सुनाया थारोज़ मिलने लगे थे उससेरोज़ खुलने लगे थे परदेदुनिया… Read more: खिड़की
- मजालआशिकी दर आशिकी , मैं ढूंढता खुद को फिराफ़ुरसतें बेज़ार सी , मैं मांगता खुद से फिराना नज़र , ना ज़र , ना कोई आसमा , ना रास्तामुफ़लसी की भीड़ थी , मैं भागता खुद से फिरा आज़माने आए जो… Read more: मजाल
- परछाईझांकती है आइने की,आखरी परत तक रूह मेरी,दिखता नही उसको कहीं,दूर तलक मुझसा कोईहै चढ़ी मुझपे परत,गुज़रे कई तूफान की,बिखरी पड़ी उसमें कहीं,पत्तियां कुछ याद सीहस्ती मेरी पानी कहीं,कहीं पुरानी शराब सीधुल रही खुद में ही,जाने क्यों बेबाक सी है… Read more: परछाई