
और फिर यूं हो रिहा !!
सोच को कुछ सोचकर तू सोच से कर दे रिहा
कुछ नहीं हासिल यहां यूं सोचने का ख़ामखां
देखता है देखकर भी यूं तेरा ना देखना
क्या करेंगे देखकर भी ये तेरी गुस्ताखियां
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झिल्लियां ख़याल की , पपड़ियां मलाल की
नाराज़गी सवाल की , कोशिशें मजाल की
शोर चीखता रहा हर बात पे बवाल सा
राख भरके रार की मांझता खुद को फिरा
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टूटे सारे ख़्वाब हों जैसे
हम ऐसे ही टूटे थोड़े
नज़र नज़र के बहते पानी
परदे फिर से खोले थोड़े
एक गुच्छा फूलों का,
देख मुझे खिला एसे
वो मेरा है, मैं उसका
कहकर यूं, मिला मुझसे
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