
इतने शोर में हम खुद को नहीं पहचान पाते
थोड़ा धीरे बोलो तो बात हो भी जाए
इतने तकल्लुफ में आंखें नहीं नज़र आतीं
थोड़ा खुलकर बोलो तो बात हो भी जाए
हर बार कुछ टटोलते हो जब भी देखते हो
थोड़ा कम तोलो तो बात हो भी जाए
बांधे बैठे हो जाने कितनी गांठे धड़कनों पे
थोड़ा दिल खोलो तो बात हो भी जाए
काली सफ़ेद तस्वीरें पूरा सच नहीं कहतीं
थोड़ा रंग घोलो तो बात हो भी जाए
जब बांचते हो अपनी ही धुन पे नाचते हो
थोड़ा संग डोलो तो बात हो भी जाए
~ ऋha
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