
तन्हाइयों से मैंने पूछा
तुम क्यों हो यहां
उसने कहा यूं ही
शायद कुछ कहना था
वक़्त यूं ही गुज़रता गया
रहो का रंग बदलता गया
गुज़रे कई हालातों से
दिल के कई ज़ज्बातों से
धड़कनों के ठहराओ पर
मैंने पूछा तुम क्यों हो यहां
उसने कहा यूं ही
शायद कुछ कहना था
फिर जिन्दगी उलझने लगी
अपनी भी सूरत बदलने लगी
सांसे भूली ठहरना जैसे
बातें भूली चहकना जैसे
कबसे खुद से मिले नहीं थे
मुद्दतों से जिए नहीं थे
भूले से कुछ टकराया
मैंने उसको पास बुलाया
पूछा तू क्यों है यहां
उसने कहा यूं ही
शायद कुछ कहना था
बस यूं ही मुसकुराते हुए
उलझनों में गुनगुनाते हुए
कभी ग़म को सहलाते हुए
कभी रातों को जगाते हुए
वो रही आस पास यूं ही
बातों में बेबाक यूं ही
मैंने कभी कहा नहीं
पर साथ वो चकती रही
सुनती रही मेरे सवाल
देती रही अपने जवाब
जाने क्यों थी वो यहां
शायद उसको बस रहना था ॥
~ऋha
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