आशिकी दर आशिकी , ढूंढता खुद को फिरा..
फ़ुरसतें बेज़ार सी , मांगता खुद से फिरा..
ना नज़र , ना ज़र , ना कोई आसमा , ना रास्ता,
मुफ़लसी की भीड़ थी , मैं भागता खुद से फिरा..
आज़माने आए जो वो आज़मा भर रह गए,
दिललगी करते परिंदे दिल लगा कर रह गए,
रख गए दहलीज़ पर , एक पिघलता आइना,
टूटती तस्वीर वो मैं जोड़ता खुद से फिरा..
झिल्लियां ख़याल की , पपड़ियां मलाल की,
नाराज़गी सवाल की , कोशिशें मजाल की,
शोर चीखता रहा हर बात पे बवाल सा,
राख भरके रार की मांझता खुद को फिरा..