आशिकी दर आशिकी , मैं ढूंढता खुद को फिरा
फ़ुरसतें बेज़ार सी , मैं मांगता खुद से फिरा
ना नज़र , ना ज़र , ना कोई आसमा , ना रास्ता
मुफ़लसी की भीड़ थी , मैं भागता खुद से फिरा
आज़माने आए जो वो आज़मा भर रह गए
दिललगी करते परिंदे दिल लगा कर रह गए
रख गए दहलीज़ पर , एक पिघलता आइना
टूटती तस्वीर वो मैं जोड़ता खुद से फिरा
झिल्लियां ख़याल की , पपड़ियां मलाल की
नाराज़गी सवाल की , कोशिशें मजाल की
शोर चीखता रहा हर बात पे बवाल सा
राख भरके रार की मांझता खुद को फिरा
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