परछाई

झांकती है आइने की, 

आखरी परत तक रूह मेरी,

दिखता नही उसको कहीं, 

दूर तलक मुझसा कोई,

है चढ़ी मुझपे परत, 

गुज़रे कई तूफान की,

बिखरी पड़ी उसमें कहीं, 

पत्तियां कुछ याद सी

हस्ती मेरी पानी कहीं, 

कहीं पुरानी शराब सी

धुल रही खुद में ही, 

जाने क्यों बेबाक सी

है चढ़ा जुनून सा, 

तोड़ता है आईने,

टुकड़ो मे भी कहीं, 

मैं मिला उसको नहीं

देखता जो तू मझे, 

मैं नहीं वो मैं नहीं

रौशनी से टकराकर, 

थी बनी परछाई कोई

खुद से उलझी हुई, 

आईनो की आज़माईश कोई,

जाने क्या आज़ाब है, 

चाहे मुझे, है या दुश्मन मेरा,

निचोड़ता है रोज़ ही, 

मेरी आंखों से मुझे,

फिर टांगकर यूं छोड़ दे, 

सूखने बेजान सा

देखता जो तू मुझे, 

मैं नहीं वो मैं नहीं

समंदरों में बहता, 

है बर्फ का टुकड़ा कोई

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