सोच को कुछ सोचकर तू सोच से कर दे रिहा
कुछ नहीं हासिल यहां यूं सोचने का ख़ामखां
देखता है देखकर भी यूं तेरा ना देखना
क्या करेंगे देखकर भी ये तेरी गुस्ताखियां
पानियों में पानियों सा हो रहा पानी रवां
पानियों से अब बता कैसे करें पानी जुदा
वो भी है बिगड़ा हुआ जो था नहीं बिगड़ा कभी
था समझने बस गया बिगड़े हुवों का रास्ता
बात अब जो है समझ की तो समझ मुझको बता
क्या समझकर समझूं तुझको क्या समझकर हो रिहा
~ऋha
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