तुम मेरे रोज़ नहीं हो,
रोज़ होते,
तो तुम्हारी नज़र जान लेते..
कहने से पहले,
तुम्हारी बात मान लेते..
तुम्हारे बगल से गुज़री,
हवा भी हमसे बात करती..
तुम्हारी शिकायतें,
तुमसे पहले हमें याद करतीं..
तुम रोज़ होते,
तो ये गुज़ारिशें ना होतीं,
हर बार की ये,
नयी रिवायतें ना होतीं..
बर तुम रोज़ नहीं हो,
तुम कभी हो..
कभी कभी में,
ये जानना मुश्किल होता है..
नज़र की करवटें,
पहचानना मुश्किल होता है..
सारी हसरतों को,
मानना मुश्किल होता है..
तुम रोज़ होते,
तो हसरतें भी
अलग कहां होतीं,
तुम्हारे दिल से हम वाकिफ़ होते..
हमारी चाहत में तुम शामिल होते..
बर रोज़ में,
क्या ये चाहतें होतीं?
कभी में,
जो बातें ख़्तम नहीं होतीं..
रोज़ में,
क्या ये बातें होतीं?
रोज़ की हसरत,
जो कभी को छीनती है मुझसे..
क्या रोज़ में,
वो हसरत रहती कहीं?
तुम कभी हो,
बर हो तो सही..
रोज़ होते,
तो कितना होते?
तुम कभी हो, बर हासिल हो,
रोज़ होते तो क्या, होते ?
~ ऋha
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