मायूसी.   “वक़्त नहीं है तेरे पास”

छोटी सी एक बात थी
कुछ सोचकर तो आए थे
थोड़े लफ़्ज़ , कुछ जज़्बात
बटोरकर तो लाए थे
ज़ुबां पर रख्खे थे तो पर
जाने दे लेकिन इस बार
कि वक़्त नहीं है तेरे पास

जाने कितने चहरों के
रंग बटोरे थे हमने
जाने कितने मौसम के
ढंग टटोले थे हमने
जाने कितने किस्से थे
कहते सुनते तेरे साथ
बर वक़्त नहीं है तेरे पास

दो पल आके बैठे भी
हो जमी रेत का ठेर कोई
आंखों की हो चुभन कभी
तेज़ धूप की जलन कहीं
हम आए तो थे लेकर बरसात
अब बरसेंगे अगली बार
कि वक़्त नहीं है तेरे पास

ये वक़्त का जो तुम करते हो
इसमे जो भी भरते हो
वो होता बहुत ही खास है
वो खास नहीं है मेरे पास
रहने दे फ़िर अबकी बार
फ़िर और कहेंगे अपनी बात
कि वक़्त नहीं है तेरे पास

~ऋha

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