निवेदन.   ‘रह जाओ दिल में हे हृशिकेश्वर !!’

रह जाओ दिल में हे गिरीघर
प्रेम रूप तुम प्राण सरोवर
भरो गार मेरी लीलाधर
रह जाओ दिल मे हे दामोदर

दिया सभी को सहज अमृतरस
कहीं वीर तुम शौर्य के पथपर
कभी गीतमय ज्ञान के सागर
हरे चित्त के उग्र हलाहल
दे पर मुझको मृदु वाणी स्वर
सु-दर्शनम् वो रूप मनोहर
रह जाओ दिल में हे मुरलीधर

तेरे परिचय के हूं तत्पर
समझ मगर थोड़ी है चंचल
तुम वेदवेद्य वेदांत योगेश्वर
भरें कहां तुमको ज्ञानेश्वर
मैं मोहाधीन अल्प-बुद्धि-धर
नयन धरूं तेरे चरणो पर
रह जाओ दिल में हे हृशिकेश्वर

~ऋha

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