बातें आगे बढ़ाएं क्या
लव्ज़ो के आगे जाएं क्या
जज़्बातों में बह जाएं क्या
इतनी भी ज़हमत उठाएं क्या
जो जान चुके होते वो उसको
यहां कहीं मिलते क्या तुझको
अब जान मगर झुठलाएं क्या
इतनी भी ज़हमत उठाएं क्या
इहां बात अगम ही आं
रहीमन कहन सुनन की नां
कलाम तेरा दोहराएं क्या
इतनी भी ज़हमत उठाएं क्या
महज़ जुबां का खेल सही
बात वही हर फेर सही
बदल ज़ुबां समझाएं क्या
इतनी भी ज़हमत उठाएं क्या
अपनी ज़हन की परतों पे भी
बिखरे पड़े हैं ज़ख़्म कई
वो राज़ तुम्हें बतलाएं क्या
इतनी भी ज़हमत उठाएं क्या
~ ऋha
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