
दो बूंद अपनी पलकों पे सजा दूं ज़रा , फिर कहूं !
मैं बात तेरी खुद को समझा दूं ज़रा , फिर कहूं !
क्या रात ने सोचा था क्या दिन ने पाया
क्या ख़्वाब ने मांगा क्या वक्त ने दिखाया
ये कशमकश दिल की सुला दूं ज़रा , फिर कहूं !
अपना नाम ख़ुद को भुला दूं ज़रा , फिर कहूं !
चांद की चमक में जो तारे फीके पड़े
आंख पे मेरी वो अंगारे तीखे पड़े
सोच के ये धब्बे मिटा दूं ज़रा , फिर कहूं !
सूरज की टिकी नज़र हटा दूं ज़रा , फिर कहूं !
टूटे पत्ते अक्सर क्यों , दामन पे आ गिरते हैं
मेरे आगे जो पिधलते हैं , क्यों मुझसे ही आ मिलते हैं
ये उलझी कड़ी अपनी सुलझा दूं ज़रा , फिर कहूं !
तेरी बात खुद को समझा दूं ज़रा , फिर कहूं !
~ऋha
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