यूं हो रिहा !!

ख़्यालों की बंदिश

क्या कहें !!

कुछ कहें ना कहें , क्या कहें!
कहने को ना हो कुछ अगर ,
फिर भी कहें , क्या कहें!

बारिश बन गिरा है अभी ,
कुछ मिट्टी में मिला है अभी
बादल टूटें हैं कहीं
या ख़्वाब बूंद हुए सारे
इन बूंदों में रहें, ना रहें , क्या कहें!

ये रस्ते भी लेकर तो जाते नहीं कहीं
हमसे मिलने भी ये आते नहीं कहीं
इनके हो रहें, ना रहें , क्या कहें!

जानते भी हों हमें , ये आसमां गर ज़रा
दूर हैं बैठे कहीं , देते नहीं कोई सदा
छोड़ दें अपना गुरुर , इनसे भी बातें करें..

कहने को यूं तो बस ,
एक छोटी सी कहानी है अपनी
ना बारिशें, ना आतिशें, ना आसमानी है अपनी
सुनने को हज़ारों दास्तां , हर ज़ुबां पर हैं रखी
उनको ही सुना करें , क्या कहें!

उगती सुबह का मासूम चहरा,
ढलती उम्र का वो कारवां,
एक रवानी जोश में सी धूमती,
है कोई यूं सोच में सा बारहा..

रंग बदलते फूलों की वो कहानी,
धुन बदलते पंछियों की ज़ुबानी
बेज़ुबां सी ढूंढती अलफाज़ सी वो
ये भी ज़रा अब कुछ कहे , हम क्या कहें!

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