छलावा

करवटें लेती ये ज़िन्दगी ,
किस किस मोड़ गुज़रेगी
टूट रहीं हैं डोर सभी ,
और कितना उलझेगी

ये परिन्दों की उड़ान सी ,
रोज़ नयी डाल ढूंढती है
ये चांद के मचान सी ,
रोज़ नयी शाम ढूंढती है
ये चलती भी है , रुकती भी है ,
ये रोज़ सिमटकर बिखरती भी है
ये अपनी ही तलाश में ,
और कितना भटकेगी

थी कारवां की गुज़ारिश ,
तो कारवां भी साथ है
थी ख़ामोशी की आज़माइश ,
वो भी हर अल्फ़ाज़ है
ये कहती भी है , सुनती भी है ,
ये हर बात , बात बदलती भी है
ये वादों के बाज़ार में ,
और कितना मुकरेगी

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