एक मचान थे कबूतर बैठे
उड़ गए सारे शाम ढले
जाने क्या तकने बैठे थे
जाने क्या चुकने उड़े मरे
उगता है सूरज दूर कहीं
इस मोड़ अभी बर शाम ढले
एक तोता भी तो आता था
इस रुख होकर जाता था
कभी रुक कर कुछ कहता था
कभी दूर से छल जाता था
उसका भी कोई हाल नहीं
आज वो भी मेरे नाल नहीं
दबे पैर सा जाता है
इस मोड़ से हर कोई परे
उगता है सूरज दूर कहीं
इस मोड़ अभी बर शाम ढले
ओ बादल गुलाबी है अभी
दिन भर सफेदी छाई थी
ये रंग भी कुछ पल रहता है
फिर ये भी तां बुझ जाए सी
दूर बत्तियां जलेंगी फिर
फिर कुछ ना आए नज़र अरे
धुंधली अलसाई आंखे बर
देख तुझे अब चांद करे
उगता है सूरज दूर कहीं
इस मोड़ अभी बर शाम ढले
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