इन्तज़ार

देर कर दी तुमने आने में,
मेरे जाने का वक़्त हुआ!
रुक जाते कुछ पल मेरे लिए,
मेरा लहज़ा भी सक्ख्त हुआ!
सुनकर ये मासूम शिकायत
सूरज थोड़ा सा मुसकाया,
बोला रे पागल इन्सान
मैं कब था तेरे लिए आया..
दिल मेरा मायूस हुआ,
उसकी चमक भी भर आई,
हर शेह ने कुदरत की मुझको
यूं मेरी हकीकत समझाई..

क्यों वो बरसों का जागा
मेरे लिए रुक जाएगा,
मेरा अदना सा चहरा
उसको क्या दे पाएगा..
फिर भी दिल रखने को मेरा,
उसने फिर से दोहराया..
मैं मिलूंगा इसी वक़्त,
कल काम जल्दि निपटाना,
इन्तज़ार मैं भी करता हूं
बर तुम थोड़ा ज़ल्दि आना..
बात अधूरी फिर वही,
फिर वो उसका बुझ जाना..

मेरा रस्ता पल भर का,
उसका सफर पुराना था
जाने कितनो ने उसको,
अपना रहबर माना था..
सुनता नहीं किसी की वो,
अपना ही दिल कच्चा है
आना उसकी रहमत है,
जाना भी उसका पक्का है..
किरन के इस छोर पर,
बैठे हम पछताते हैं
जाने क्यों टूट कर आए थे,
जाने कहां अब जाते हैं…

सोचते हैं जब एक दिन,
हम उससे फिर मिल जाएंगे..
शामिल होंगे उसमें हम,
या वो हमसे हो जाएंगे..
वक़्त चलाता है उसको,
या बस हमसे मिलने आता है
पूछें चाहे हम कितना,
कुछ भी कहां बताता है
नादानी में अपनी हम,
अपना ही दिल जलाते हैं..
रुकता नहीं वो कभी,
हम फिर भी मिलने आते हैं…

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