Poetry: आईना (mirror)  “वो भी आवाज़ लगा रहा था !”

रोज़ कई लोग आते हैं
मुझसे पूछने कि वो कौन हैं
मैं उनको रुबरु करता हूं
कहता हूं कि देखो अपनी आंखों में
और जानो ख़ुद को

पर जाने क्यों वो यूं ही मुस्कुराकर
अपने बालों पे ऊंगलियां फिरा कर
थोड़ा सा आंखों से इतराकर
हाथ हिलाकर चले जाते हैं
मैं रोज़ आवाज़ लगाता हूं
कहता हूं वो एक लकीर
जो तुम्हारे माथे पे उभर आती है
कभी तो मिलो उससे
कभी तो देखो मुझमें
कभी तो मिलो खुदसे

बस मैं यूं ही आवाज़ देकर रह जाता हूं
फिर सामने रखे फूल से बतियाता हूं
वो भी कुछ दिन पहले
यूं ही मुसकुराता था
आज थका हुवा सा
अपनी पंखड़ियों को झुकाए
थोड़ा सा रुक रुक कर
अपनी कहानी सुना रहा है
मेरी तरह वो भी आवाज़ लगा रहा है

वो भी जब खिला था
खूब इतराया था खुद पर
सहमा हुवा सा आंखे मूंदे
खूब मुसकाया था खुद पर
पहली बार जब हवा का झोंका
सहला कर गुज़रा था
उसको लगा खुद कुदरत ने
उसके लिए भेजा था
रोज़ झूमता नाचता था उसमें
हर पंखुड़ी से झांकता था उसमें
यूं ही ज़िन्दगी के नशे में
ना जाने कब मज़े मज़े में
वो इस गुल्दस्ते में आ गिरा था
उसको ख़याल भी ना था
कि वो अपनी शाख से जुदा था

कल वो भी मुझे देखकर
मुस्कुरा रहा था
यूं ही इतराकर हाथ हिला रहा था
आज थका हुवा सा
अपनी पंखड़ियों को झुकाए
थोड़ा सा रुक रुक कर
अपनी कहानी सुना रहा है
मेरी तरह वो भी आवाज़ लगा रहा है ॥

~ऋha

Leave a comment