Poetry : आदत ( Habbits )   “थमें पाथिक जो अलसाए”

सम समय के समतल पे
पड़ी सोच जो जम जाए
ये भी आदत ना बन जाए

ठहरे पानी के तल पे
नज़र रुकी जो पथराए
ये भी आदत ना बन जाए

छिड़े सुकूं का राग कोई
भरे हृदय के दाग कोई
दिखे क्षितिज का ही प्रतिबिंब
थमें पाथिक जो अलसाए
ये भी आदत ना बन जाए

कहे कौन और सहे कौन
खुद में ही फिर बहे कौन
कलह की गर्दों से छुपकर
ख़ामोशी को फुसलाए
ये भी आदत ना बन जाए

ना प्रयास का मान रहे
ना चाहत की शान रहे
अवसाद का लेकर आलिंगन
सोच तलक से घबराए
ये भी आदत ना बन जाए

~ ऋha

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