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  • इन्तज़ार

    June 14, 2026
    poetry

    देर कर दी तुमने आने में,
    मेरे जाने का वक़्त हुआ!
    रुक जाते कुछ पल मेरे लिए,
    मेरा लहज़ा भी सक्ख्त हुआ!
    सुनकर ये मासूम शिकायत
    सूरज थोड़ा सा मुसकाया,
    बोला रे पागल इन्सान
    मैं कब था तेरे लिए आया..
    दिल मेरा मायूस हुआ,
    उसकी चमक भी भर आई,
    हर शेह ने कुदरत की मुझको
    यूं मेरी हकीकत समझाई..

    क्यों वो बरसों का जागा
    मेरे लिए रुक जाएगा,
    मेरा अदना सा चहरा
    उसको क्या दे पाएगा..
    फिर भी दिल रखने को मेरा,
    उसने फिर से दोहराया..
    मैं मिलूंगा इसी वक़्त,
    कल काम जल्दि निपटाना,
    इन्तज़ार मैं भी करता हूं
    बर तुम थोड़ा ज़ल्दि आना..
    बात अधूरी फिर वही,
    फिर वो उसका बुझ जाना..

    मेरा रस्ता पल भर का,
    उसका सफर पुराना था
    जाने कितनो ने उसको,
    अपना रहबर माना था..
    सुनता नहीं किसी की वो,
    अपना ही दिल कच्चा है
    आना उसकी रहमत है,
    जाना भी उसका पक्का है..
    किरन के इस छोर पर,
    बैठे हम पछताते हैं
    जाने क्यों टूट कर आए थे,
    जाने कहां अब जाते हैं…

    सोचते हैं जब एक दिन,
    हम उससे फिर मिल जाएंगे..
    शामिल होंगे उसमें हम,
    या वो हमसे हो जाएंगे..
    वक़्त चलाता है उसको,
    या बस हमसे मिलने आता है
    पूछें चाहे हम कितना,
    कुछ भी कहां बताता है
    नादानी में अपनी हम,
    अपना ही दिल जलाते हैं..
    रुकता नहीं वो कभी,
    हम फिर भी मिलने आते हैं…

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  • झपकी

    June 13, 2026
    poetry

    मैं नींद में हूं , मुझे रहने दे ,
    दो पल यूं ही बहने दे..
    क्या पूछे कोई मुझसे ,
    अपना क्या, पराया क्या
    दुनिया में कमाया क्या ,
    छूटा क्या, मिटाया क्या,
    हमको रास आया क्या..
    मैं नींद में हूं , मुझे रहने दे

    जागेंगे तो फिर देखेंगे,
    सूरज क्या , चांद क्या
    बादलों की चाल क्या,
    बारिश के अरमान क्या,
    लहरों की सुर ताल क्या,
    रंगो का हाल क्या,
    इनसे अपना फिलहाल क्या,
    मैं नींद में हूं , मुझे रहने दे..

    पागलपन ये मेरा है,
    लोगों पर इल्ज़ाम क्यों,
    दर्द जो सारे मेरे हैं,
    करूं किसी के नाम क्यों..
    मैं भी इन्हें संभालूं क्या,
    रख चौखट , राह निहारूं क्या,
    भर नज़र , नज़र उतारूं क्या,
    इनको भी मुझसे बरहाल क्या,
    मैं नींद में हूं , मुझे रहने दे..

    भूलूँ गर रस्ता अपना,
    ना याद दिला अब यार मेरे,
    ले डूबे मुझको सारे
    मिलकर ये आज़ार मेरे..
    एक धुन कान में नाचती है
    फिर देर तक मुझमें जागती है ,
    एक पंख हवा में है अभी
    मेरे हाथों से दूर कहीं ,
    रात तो वो गुज़र चुकी
    जाहिर हैं लेकिन चांद कई ,
    मैं नींद में हूं , मुझे रहने दे
    दो पल यूं ही बहने दे …

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  • खिड़की

    June 12, 2026
    poetry

    खिड़की सी ये ज़िन्दगी,
    परदों में सिमटी सी,
    परत दर परत परदे खुले,
    कुछ नये यूं रिश्ते जुड़े..

    एक दिन खोला परदा थोड़ा
    एक पत्ता नज़र आया था
    बहुत देर तक उस पत्ते को,
    अपना हाल सुनाया था
    रोज़ मिलने लगे थे उससे
    रोज़ खुलने लगे थे परदे
    दुनिया लगी हंसीन कुछ,
    अब तक क्यों छुपाया था
    उस पत्ते में ही सिमटा सा
    फिर, दिल ये नज़र आया,
    सोचा अब इसके बिना
    जीना ना होगा अपना
    अगले ही दिन, पत्ता मेरा
    मौसम के आगे हार गया
    टूटे पत्ते ने उस दिन
    कुछ तो नया सिखाया था
    फिर हमने, वो अपना दिन
    परदे के पीछे बिताया था

    टूटे सारे ख़्वाब हों जैसे
    हम ऐसे ही टूटे थोड़े
    नज़र नज़र के बहते पानी
    परदे फिर से खोले थोड़े
    एक गुच्छा फूलों का,
    देख मुझे खिला एसे
    वो मेरा है, मैं उसका
    कहकर यूं, मिला मुझसे
    पत्ते की यादों से दिल
    अभी भरा ना था वैसे
    उन फूलों ने लेकिन,
    मुझे मिलाया फिर मुझसे
    इस बार पता था, यूं तो
    ये फूल भी झड़ जाएंगे
    वक्त से, अब क्या, कब तक
    कितना ही, टकराएँगे
    हमने भी उसके आगे
    अपना दिल किया थोड़ा
    वक्त के आगे सच हारा
    इस बार, झूठ जिया थोड़ा!

    परत दर परत परदे खोले
    हर रंग नज़र अपना किया
    जहां मिला, जो मिला,
    जैसे मिला, सबको जिया
    दुनिया कब अपनी हुई
    कब नज़र में समाई ये..
    खिड़की सी ये ज़िन्दगी!
    किसको पूरी नज़र आई ये
    जितनी नज़र आए
    उतनी हम में धुलती जाए ये!

    खुल गये परदे लो सारे
    दीवारें अब तोड़ें क्या?
    आगे जाने क्या कुछ है
    अब आगे दुनिया जोड़ें क्या !!

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  • मजाल

    June 12, 2026
    poetry

    आशिकी दर आशिकी , मैं ढूंढता खुद को फिरा
    फ़ुरसतें बेज़ार सी , मैं मांगता खुद से फिरा
    ना नज़र , ना ज़र , ना कोई आसमा , ना रास्ता
    मुफ़लसी की भीड़ थी , मैं भागता खुद से फिरा

    आज़माने आए जो वो आज़मा भर रह गए
    दिललगी करते परिंदे दिल लगा कर रह गए
    रख गए दहलीज़ पर , एक पिघलता आइना
    टूटती तस्वीर वो मैं जोड़ता खुद से फिरा

    झिल्लियां ख़याल की , पपड़ियां मलाल की
    नाराज़गी सवाल की , कोशिशें मजाल की
    शोर चीखता रहा हर बात पे बवाल सा
    राख भरके रार की मांझता खुद को फिरा

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  • परछाई

    June 12, 2026
    poetry

    झांकती है आइने की,
    आखरी परत तक रूह मेरी,
    दिखता नही उसको कहीं,
    दूर तलक मुझसा कोई
    है चढ़ी मुझपे परत,
    गुज़रे कई तूफान की,
    बिखरी पड़ी उसमें कहीं,
    पत्तियां कुछ याद सी
    हस्ती मेरी पानी कहीं,
    कहीं पुरानी शराब सी
    धुल रही खुद में ही,
    जाने क्यों बेबाक सी

    है चढ़ा जुनून सा,
    तोड़ता है आईने,
    टुकड़ो मे भी कहीं,
    मैं मिला उसको नहीं
    देखता जो तू मझे,
    मैं नहीं वो मैं नहीं
    रौशनी से टकराकर,
    थी बनी परछाई कोई

    खुद से उलझी हुई,
    आईनो की आज़माईश कोई,
    जाने क्या आज़ाब है,
    चाहे मुझे, है या दुश्मन मेरा,
    निचोड़ता है रोज़ ही,
    मेरी आंखों से मुझे,
    फिर टांगकर यूं छोड़ दे,
    सूखने बेजान सा

    देखता जो तू मुझे,
    मैं नहीं वो मैं नहीं
    समंदरों में बहता,
    है बर्फ का टुकड़ा कोई

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