
दिल सिमट रहा था देर से
कि तू आया
ये तड़प रहा था देर से
कि तू आया
इन ख्यालों को लगाम दें भी तो क्या
तुझको अब पैग़ाम दें भी तो क्या
एक सुकून सा है , जो तू है
इस सुकून को इल्ज़ाम दें भी तो क्या
एक धुंध थी , एक साया था
कि तू आया
कुछ जज़्बों ने दोहराया था
कि तू आया
एसे भी होती है , यूं तो बसर , कहते हैं
अपने आगे भी है , कुछ तो सफर , कहते हैं
हम बिगड़े हुए नज़र के , कहां किसी डगर के हुए
हम जैसों से कब , मिलता है सबर , कहते हैं
फिर नज़रों ने बहकाया था
कि तू आया
फिर रस्तों ने भटकाया था
कि तू आया
~ऋha
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