खिड़की

खिड़की सी ये ज़िन्दगी,
परदों में सिमटी सी,
परत दर परत परदे खुले,
कुछ नये यूं रिश्ते जुड़े..

एक दिन खोला परदा थोड़ा
एक पत्ता नज़र आया था
बहुत देर तक उस पत्ते को,
अपना हाल सुनाया था
रोज़ मिलने लगे थे उससे
रोज़ खुलने लगे थे परदे
दुनिया लगी हंसीन कुछ,
अब तक क्यों छुपाया था
उस पत्ते में ही सिमटा सा
फिर, दिल ये नज़र आया,
सोचा अब इसके बिना
जीना ना होगा अपना
अगले ही दिन, पत्ता मेरा
मौसम के आगे हार गया
टूटे पत्ते ने उस दिन
कुछ तो नया सिखाया था
फिर हमने, वो अपना दिन
परदे के पीछे बिताया था

टूटे सारे ख़्वाब हों जैसे
हम ऐसे ही टूटे थोड़े
नज़र नज़र के बहते पानी
परदे फिर से खोले थोड़े
एक गुच्छा फूलों का,
देख मुझे खिला एसे
वो मेरा है, मैं उसका
कहकर यूं, मिला मुझसे
पत्ते की यादों से दिल
अभी भरा ना था वैसे
उन फूलों ने लेकिन,
मुझे मिलाया फिर मुझसे
इस बार पता था, यूं तो
ये फूल भी झड़ जाएंगे
वक्त से, अब क्या, कब तक
कितना ही, टकराएँगे
हमने भी उसके आगे
अपना दिल किया थोड़ा
वक्त के आगे सच हारा
इस बार, झूठ जिया थोड़ा!

परत दर परत परदे खोले
हर रंग नज़र अपना किया
जहां मिला, जो मिला,
जैसे मिला, सबको जिया
दुनिया कब अपनी हुई
कब नज़र में समाई ये..
खिड़की सी ये ज़िन्दगी!
किसको पूरी नज़र आई ये
जितनी नज़र आए
उतनी हम में धुलती जाए ये!

खुल गये परदे लो सारे
दीवारें अब तोड़ें क्या?
आगे जाने क्या कुछ है
अब आगे दुनिया जोड़ें क्या !!

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