कविता: हमसफ़र  “ज़रूरी नहीं है !!”

हर राह कोई, हमसफ़र हो,
ज़रूरी नहीं है..
खूबसूरत, हर डगर हो,
ज़रूरी नहीं है..

है ज़रूरी, दिल का मेरे,
चाह किए जाना..
चाहतों के जाम भरना,
और पिए जाना..
हर चाह बर, उसको नज़र हो,
ज़रूरी नहीं है..
ख़त्म बस, उस पर सफ़र हो ,
ज़रूरी नहीं है..

ना बैर है, ना ग़ैर है,
ना आसरा कोई..
ना मंजिलों से है मेरा,
अब फासला कोई..
ढूंढते हैं ये कदम,
बर रास्ता कोई..
एक मंज़िल, ही बसर हो,
ज़रूरी नहीं है..
हर राह मंज़िल का, सफ़र हो,
ज़रूरी नहीं है..

हूं ज़रा बराबाद मैं ,
या कि फिर आज़ाद हूं..
मानता तुझको नहीं,
या खुद में ही आबाद हूं..
तंज हैं मुझपे रखे ,
बेफिक्र , नामुराद हूं ..
हर रंज का, मुझपर असर हो,
ज़रूरी नहीं है..
हर कोई अपना, हमनज़र हो,
ज़रूरी नहीं है..

झूठ का ना, गिला कोई..
सच का भी हो, शुक्र क्या..
मौत ही एक, सत्य है,
ये ज़िन्दगी का, झूठ था..
हो स्वयं ही जो मृषा ,
ढूंढें उसका, मूल क्या..
हर बार ही, सच की तलब हो,
ज़रूरी नहीं है..
हर झूठ, अंधेरी डगर हो,
ज़रूरी नहीं है..

~ ऋha

Leave a Reply