कविता:  कलि  “जशन मनाए पानी में बह जाने का भी”

खिलती कलि को क्या बताए कोई,
दिन आएगा मुरझाने का भी..

हवाओं का ये सहलाना,
घटाओं का ये बहलाना,
बूंदों का ये गुदगुदाना,
सूरज का ये मुसकुराना,

यादों का घर बन जाएगा,
मंज़र ये इठलाने का भी..
खिलती कलि को क्या बताए कोई,
दिन आएगा मुरझाने का भी..

बने इत्र तो रह जाओगे,
खुशबु बनकर सांसों में..
रंग रंग सा बिखरोगे वो,
भरे चमक जो आंखों में..

बने कभी मिठास मधु की,
कहीं तितली के रंग भरे,
कभी किसी की चाहत बनकर,
गुलदस्तों की शान बने..

फूलों को कोई ग़म ना होता,
ऐसे तो मिट जाने का भी..
खिलती कलि को क्या बताए कोई,
दिन आएगा मुरझाने का भी..

थके हुए मुसफिर की,
मुसकान बन रह जाता है..
खिलता हुआ गुलाब एक,
कितने दिल बहलाता है..

जाने गर फ़न इसके कोई,
लाखों मर्ज़ो की दवा बने..
फूल भी क्या कभी किसीके,
नाम से जाना जाता है ?

जाते जाते जशन मनाए,
पानी में बह जाने का भी..
खिलती कलि को क्या बताए कोई,
दिन आएगा मुरझाने का भी..

अभी खिली है, खिल जाने दो..
खुद पर इसको इतराने दो..
अपनी किसमत ये आप बुने..
अपनी कहानी, आप चुने..

किसी नादान बच्चे की,
शरारत बन ना रह जाए !
महज़ कहीं दिवारों की,
सजावट बन ना रह जाए !

जाने खुद को, पहचाने खुद को,
ना रखे मलाल कुम्हलाने का भी,
खिलती कलि को क्यों बताए कोई,
दिन आएगा मुरझाने का भी ॥

~ ऋha

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