Poetry:  भ्रांति ( Delusions )  ॥ भरम लगा है भरम जगा है ॥

मैं ही मैं था हर लम्हा,
मैं ही मैं भर आया था,
मैं ही मैं हरसू था जब,
क्यों ये मंच रचाया था ॥

धुंध धुंध हर नज़र हुई,
हर मंज़र धुंधसाया था,
होना तेरा धुंध धुंध सा,
ना होना जान भुलाया था ॥

ख़्वाब ख़्वाब सी दुनिया ये,
ख़्वाब ख़्वाब दिखलाया था,
ख़्वाब ख़्वाब था मैं भी जब,
ख़्वाब ख़्वाब टकराया था ॥

भरम लगा है, भरम जगा है,
भरम भरम सी रातें हैं,
भरम भरम को भरम सुनाए,
भरम देर हरषाया था ॥

रिहा चलो फिर रिहा करें अब,
रिहा जब हर अरमान हुआ,
रिहा वो मुझसे रिहा मैं उससे,
रिहा ना दिल हो पया था ॥

~ ऋha

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